225 रुपये की छिनतई पर 33 साल बाद आया फैसला, मुजफ्फरपुर का मामला बना चर्चा का विषय
बिहार के मुजफ्फरपुर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न्याय प्रक्रिया की धीमी रफ्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं. महज 225 रुपये की कथित छिनतई और मारपीट का केस 33 वर्षों तक अदालत में लंबित रहा. आखिरकार सोमवार को एसीजेएम-प्रथम पश्चिमी पंकज कुमार तिवारी की अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में अपना फैसला सुनाया.
यह मामला वर्ष 1992 का है. 22 दिसंबर 1992 को कुढ़नी थाना क्षेत्र के खरौना जयराम गांव निवासी नवल किशोर चौधरी ने शिकायत दर्ज कराई थी. आरोप था कि जमीन विवाद को लेकर सत्यानंद चौधरी और उनके परिवार के सदस्यों ने उन्हें घेरकर मारपीट की और उनके कोट की जेब से 225 रुपये छीन लिए. साथ ही उनकी साइकिल को भी जबरन रोकने का आरोप लगाया गया था.
इस मामले में एक ही परिवार के पांच लोगों को आरोपी बनाया गया था. लेकिन लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दो आरोपियों—सत्यदेव चौधरी और हरिशंकर चौधरी—की मौत हो गई. बाकी बचे तीन आरोपियों पर मुकदमा चलता रहा. करीब तीन दशक तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में जीवित तीनों आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया. अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका. बताया जा रहा है कि यह केस संबंधित अदालत का सबसे पुराना लंबित मामला था.
इस फैसले के साथ ही एक परिवार को वर्षों से चल रहे कानूनी संघर्ष से राहत मिली. हालांकि, 225 रुपये जैसे छोटे विवाद पर 33 साल तक मुकदमा चलना न्याय व्यवस्था में देरी को लेकर कई सवाल भी खड़े कर रहा है.
